अग्नि की उड़ान-2

  उन्हें नौकरी के क्रम में उन्हें कानपुर आना पडा़ था जो रामेश्वरम के शांत माहौल से एकदम विपरीत था. उन्हें सबसे अधिक मुश्किल 'आलू' को लेकर हुई जो उन्हें सुबह से रात तक खाने को मिलता.लोगों को रोजगार के लिए भटकते देखकर उन्हें काफी दुख होता था.
   उनकी पहली पसंद पायलट बनना था जो कि उनकी शारीरिक योग्यता के कारण नहीं हुई. इससे दुखी होकर वें ऋषिकेश जाकर गंगा स्नान किए और महात्मा शिवानन्द से मिलें.उन्होंने अपनी पहली नौकरी 250 रुपए के वेतन पर वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद की.लेकिन उन्हें हमेशा खुद को साबित करना पड़ा.
           वे कार्यशाला में मस्जिद की तरह ही जूते उतार कर जातें थे ं.वे अपने काम के दौरान जब भी परेशान होते ं अपने बचपन में चले जाते ं.कलाम साहब अपने जीवन में सबसे अधिक डाक्टर विक्रम साराभाई से प्रभावित थें.साराभाई की जिदांदिली देखकर वे हमेशा दंग रह जाते ं.
             भारतीयों के अहंकार को उनकी तरक्की का वे सबसे बाधक मानते थे कलाम साहब.वे कहा करते थे ं की सभी बुद्धिमान मनुष्य अपने को दुनिया के अनुरूप ढाल लेते हैं.सिर्फ कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया को अपने अनुरूप बनाने में लगें रहते हैं.दुनिया में सारी तरक्की इन दूसरे तरह के लोगों पर ही निर्भर होती है, जो हमेशा कुछ नया कर परिवर्तन लाने में लगे रहते हैं.कई बार  उनके खिलाफ शाजिश हुईं, उन्हें दबाया गया लेकिन वे हर बार आगे निकल के रास्ते ढुंढते.
            "जीतने " के लिए वे हमेशा यही कहा करते की ये भूल जाओ की तुम जितने के लिए काम करना है बस. 

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