कर्मभूमि -प्रेमचंद (भाग -2)

आपने अब तक जाना कि अमरकांत विवाहित होने के बावजूद सकीना नाम की मुस्लिम स्त्री से प्यार करने लगता है.यह बात वह अपने दोस्त सलीम को बताता है.सलीम उसे समझात है कि ये सब गलत है.लेकिन अमरकांत नहीं मानता सलीम उसे अपनी गजल सुनाता है.
     "यही दुनियाए उलफत में, हुआ करता है होने दो
      तुम्हें हंसना मुबारक हो, कोई रोता है रोने दो."

  "  कसम ले लो जो शिकवा हो तुम्हारी बेवफाई का
     किए की अपने रोता हूँ मुझे जी भर के रोने दो."
    एक दिन अमरकांत का अपने पिता के साथ बहस हो जाती है और वह घर छोड़ देता है. उसके साथ उसकी पत्नी सुखदा, उसका बच्चा भी घर छोड़ देते हैं तो बहन नैना भी साथ जाने के लिए रोने लगती.अब इन सब की जिम्मेदारी अमरकांत के कंधों पर आ जाती है.अमरकांत फेरी का काम करने लगता है.सुखदा एक विद्यालय में बढाने लगती है.लेकिन सुखदा को अमरकांत का फेरी का पसंद नहीं है.इस बात को लेकर दोनों में झगड़ा होता है.अमरकांत सकीना से सारी बात कह कर अपना मन हल्का करता है इधर समरकांत एकले हैं.असुविधा के कारण समरकांत की तबियत खराब हो जाती है तो सुखदा और नैना जाकर उनका खाना बना आती है.इधर सकीना की शादी की बात चलती है . अमरकांत यह बात सुन घबरा जाता है और सकीना से जाकर कहता है कि "वह उससे प्रेम करता है मैं तुम्हें पाने के लिए कुछ भी कर सकता हूँ."
      इस पर सकीना कहती है कि वह हमेशा उसकी ही रहेगी.वह शादी से इनकार कर देगी.और जब तक जीएगी इस मुहब्बत के चराग़ जलाए रखेगी "
  एक दिन जब अमरकांत सकीना से मिलने आताहै तो सकीना की बुढी दादी देख लेती है और खूब हंगामा करती है.शर्म के कारण अमरकांत घर बार, शहर छोड़ कर भाग जाता है. और गांव गांव घुम कर लोगों को जागरूक करता है.इधर घर पर चुप्पी छा जाती है.कोई अमरकांत की चर्चा नही करता.बहन नैना छुप छुप कर भाई के लिए रोती है.अमरकांत के शिक्षक शान्तिकुमार छोटी जातीयों के लिए मंदिर खुलवाने के लिए आंदोलन करते हैं.नैना भी इसमें सहयोग करती है.दोनों एक दूसरे से आकर्षित हो जाते हैं.
     सुखदा सारे संसार से विरक्त हो जाती है अब उसे अपने बच्चें से भी लगाव नहीं है लेकिन वह सकीना से सहानुभूति रखती है.उससे मिलने जाती है.जहाँ जाकर उसे एहसास होता है कि गलती उसकी भी थी.उसने अमरकांत को समझने की कोशिश नहीं की.एक दिन आंदोलन में लाठीयां और गोलीयाँ चल जाती है शान्तिकुमार घायल हो चुके होते हैं.और हरिजनों पर पुलिस गोलीयाँ चलाती है तब सुखदा आकर मैदान में खडी हो जाती है और आंदोलन का नेतृत्व करती है.
     अब सुखदा समाजिक कार्यों में खुद को लगा देती है.वह अब बिलकुल बदल गई है.वह गरीबों, लाचारों, असहायों के लिए अपना जीवन झोक देती है.उधर अमरकांत भी अपना जीवन समाजिक कार्यो में लगा देता है.चले बाकी कहानी अगले भाग में 😊
  

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