गबन (भाग 3) , प्रेमचंद (31 जुलाई 1880- 8 अक्टूबर 1936)

चलिए जानते हैं आगे की कहानी 🥰🥰
      रतन जो वकिल साहब की पत्नी थी उसके बुरे दिन शुरू हो जाते हैं.वकील साहब क तबीयत बिगड़ी जाती है.रतन उन्हें लेकर कई डाक्टरों के चक्कर लगाती है.कई जगह जाती है.लेकिन उनकी हालत नही सुधरती.रतन को बहुत पछतावा होता है.वह अपने बर्ताव को लेकर दुखी होती है जो उसने वकील साहब के साथ किए.वह तो हमेशा मौज मस्ती में ही मगन रहती थी शायद ही कभी उसने पत्नी धर्म निभाया हो, उनका ध्यान भी नहीं रखती, कभी प्यार से पल दो पल साथ भी नहीं रहती...... अब जब वो छोड़ कर जाने वाले हैं तो उसे अपनी सारी गलती याद आती है.और एक सुबह वाकई वकील साहब चल बसे.रतन के पास रोने के सिवाय कुछ नहीं बचता...... अब उसके आंखों से सिर्फ गंगा- यमुना बहती रहती है.कितना महान परिवर्तन! वह जो मच्छर के डंक को सहन न करता, उसे अब चाहे मिट्टी तले तबा दो या जला दो... वो उफ् तक नहीं कहेगा.
         इधर रमानाथ शतरंज की बाजी जीत जाता है.जीते पैसे से वह चाय की दुकान खोल लेता है.अब उसके जीवन में आराम है.जग्गो उसे बेटे की तरह प्यार करती है और देवीदीन की तो उसमें जान बसती है.वह भी दोनों को अपने माँ बाप की तरह प्यार करता है.पैसे आने के बाद उसके शौक फिर से जाग जातें हैं.लेकिन वह बाहर जाने से डरता है.उसे डर है कि जो पैसे उसने प्रयागराज में गबन किए थे उसपर केस चल रहा होगा.और पुलिस उसे ढुढ़ रही होगी.इस डर से वह शाम होने के बाद ही घर से बाहर निकलता है.एक दिन वह थियेटर देखने जाता है.चारो तरफ देखते हुए वह आगे बढता है.एक पुलिस पर नजर पडती है तो वह घबरा जाता है.पुलिस भांप लेता है कि कुछ गोल माल है और वह रमानाथ को जेल में डाल देता है.
       इधर जालपा को शतरंज के जरिये पता चल जाता है कि रमानाथ कलकत्ते में है.वह उसे लाने के लिए अपने एक देवर के साथ कलकत्ता चल देती है.जहाँ जाकर वह देवीदीन और जग्गो से मिलती है.और उसे पता चलता है कि रमानाथ को पुलिस पकड़ कर ले गई. जालपा अपने देवर को घर भेज देतीं है.और वह वहीं देवीदीन के घर रह कर रमानाथ को बचाने का उपाय करती है.जालपा देवीदीन और जग्गो को सास-ससुर की तरह इज्जत करती है.रमानाथ को पुलिस सरकारी गवाह बना लेती है.लेकिन जिसके खिलाफ गवाही देनी है वह निर्दोष हैं.वे सभी क्रांतिकारी है और देश के आजादी के लिए लड़ रहे थे.जब यह बात जालपा को पता चलती है कि रमानाथ निर्दोष क्रांतिकारीयों के खिलाफ गवाही दे रहा है तो वह गुस्से में आ जाती है
बाकी कहानी अगले भाग में 🥰🥰

Comments

Popular posts from this blog

One Indian Girl-3, by -Chetan Bhagat (22April, 1974)

सेवासदन (उपन्यास) - प्रेमचंद(31जुलाई 1880 - 8 अक्टूबर 1936)

सेवासदन- प्रेमचंद (31जुलाई 1880 - 8 अक्टूबर 1936)