प्रेमाश्रम - उपन्यास, उपन्यासकार -प्रेमचंद (31जुलाई 1880- 8 अक्टूबर1936)

प्रेमचंद के कलम से निकलने वाली एक बहुत ही सारगर्भित उपन्यास. वैसे तो प्रेमचंद की रचनाओं का सारांश लिखना असंभव काम है लेकिन फिर भी मैं यह प्रयास करती हूँ.
   प्रेमाश्रम 1921 आई. उस समय किसान अंग्रेजों जमीदारों, ताल्लुकदारों, पटवारी, करिंदा के हाथों लुटे, खसोटे जातें थें. उनकी आजीवन मेहनत की कमाई को ये टैक्स, मालगुजारी, तहसीलदारी आदी कितने बहाने से ऊपर ही ऊपर छीन लेते थें और ये जो रात दिन, सुबह शाम, बारहों मास खुन पसीना बहाने बहाते थें वे दो वक्त की रोटी को भी तरसते थें. उसका विवरण हो या पति- पत्नी के रिश्ते की या यों कहें कि जीवन का वो कौन सा भाग हो भला उनकी लेखनी से अछुती हो... 
        प्रेमाश्रम की शुरुआत किसानों बात -चीत से शुरू होती है जिसमें वे जमींदारों से प्रताड़ना का दुखड़ा रोना रोते हैं. जहाँ उन्हें जमींदारों से अधिक न्यायप्रिय, परिश्रमी  अग्रेज लगतें हैं.जमींदारों की के तरह तरह से उन्हें नोचे जाने की भी चर्चा वे करते हैं. इनमें मनोहर, बासीत,आदिल, सखुआ,मुन्ना आदी किसान हैं.
      यह कहानी बनारस के पास के लखनपुर गाँव की है. जहाँ जटाशंकर और प्रभाशंकर नाम के दो ठाकुर थें. ये भाई थें. इनके पास इलाके की जमींदारी थी. जिसे छोटे भाई प्रभाशंकर संभालते थें और बड़े भाई जटाशंकर पुजा -भागवत में रहते थें. आपस में बहुत प्रेम था. जटाशंकर के दो बेटे थें- प्रेमशंकर और ज्ञानशंकर. प्रभाशंकर के पांच संतान थें तीन बातें और दो बेटीयाँ.जिनमें से बड़ा लडका दरोगा था. इधर जटाशंकर के बड़े  बेटे प्रेमशंकर , घरवालों को बिना बताये पत्नी को रोता छोड़ विदेश पढने के लिए चले गए. और दुसरा बेटा ज्ञानशंकर बहुत ही महत्वकांक्षी थें. उसे अपने चाचा के जमीदारी करने का ढंग बिलकुल पसंद नहीं था. उसने बी.ए करने के बाद जमीदारी अपने चाचा से ले ली.
  बाकी के लिए अगले भाग का इंतजार करें 😊😊🥰🥰

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