सेवासदन -प्रेमचंद (31जुलाई 1880 - 8 अक्टूबर 1936)

       चलिए आगे जानते हैं.🥰शांता और सुमन जिस आश्रम में रहते हैं वहां जाने कैसे लोगों को भनक लग जाती है कि सुमन तवायफ थी... और आश्रम की औरतें आश्रम छोड़कर भागने लगती हैं जबकि सुमन एकदम बदल चुकी है.सबकी सेवा करती है.जिससे सुमन और शांत परेशान हो जाती है.
      इधर सदन यह सब बात जान जाता है कि शांता को उसके चाचा जी आश्रम में लाकर रखें हैं.अब वह परेशान हो जाता है.उसे अपनी जिम्मेदारी का एहसास होता है.और वह नाव का व्यपार करना शुरू कर देता है.आश्रम में सुमन अपना गुजारा नही होता देखकर शांता को मामा के घर पहुँचा कर खुद आत्महत्या करने की ठान लेती है.जब वे दोनों नदी किनारे नाव के लिए जाती है तो वहाँ सदन मिल जाता है.सदन उन्हें रोक लेता है और कहता है कि अब आप लोग मेरी जिम्मेदारी हैं.वह उन्हें चाचा के घर न ले जाकर नदी किनारे ही झोपडे में रखता है.वही नदी किनारे ही विवाह की बची हुई रस्में होती है लेकिन उसके चाचा पदम् सिंह शामिल नहीं होतें हैं.न ही परिवार का कोई सदस्य.
      शांता प्रेम में मग्न रहती है और सुमन सारे घर के काम काज करती है.यही सदन जो कभी सुमन पर जान देता था वो अब उससे कुष्ठ रोगी की भांति बचता है.शांता भी उलाहना देती रहती है.दोनों चाहते हैं कि सुमन उनके घर से निकल जाए.सब कुछ समझते हुए भी सुमन रुकी रहती है क्योंकि कि शांता को बच्चा होने वाला है.और ऐसे मुश्किल वक्त में किसी का रहना जरुरी है.जब बच्चा होने पर जब सदन के मां बाप आतें हैं तो सुमन का यह आश्रय भी छीन जाता है.
       शहर से बाहर एक सेवासदन का निर्माण होता है जहाँ तवायफों की लडकीयों को उनसे अलग रखकर, उन्हें अच्छा जीवन देने का प्रयास किया जाता है.वहाँ की सारी तैयारी पदम् सिंह, उनके मित्र विठ्ठल दास और गजानंद किए हैं.उसके संचालन की जिम्मेदारी सुमन को मिलती है.सुमन बहुत ही प्यार से सभी बच्चीयों की परवरिश करती है.सारे आश्रम का संचालन करती है.उसके इस कर्तव्य पालन को देखकर सारे शहर में उसकी प्रशंसा होती है.एक तवायफ से इस महान पद पर पहुचने की अमिट गाथा ही सेवासदन है.किस तरह आदमी परिस्थिति वश क्या से क्या हो जाता है........ अगर आपलोगो को समय मिले तो अवश्य इसे पढिए गा🥰🥰

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